Book 1 • Chapter 5
Section 5
11 verses
Verse 1
मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा
Verse 2
बायस पलिअहिं अति अनुरागा होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा
Verse 3
बंदउँ संत असज्जन चरना दुखप्रद उभय बीच कछु बरना
Verse 4
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं मिलत एक दुख दारुन देहीं
Verse 5
उपजहिं एक संग जग माहीं जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं
Verse 6
सुधा सुरा सम साधू असाधू जनक एक जग जलधि अगाधू
Verse 7
भल अनभल निज निज करतूती लहत सुजस अपलोक बिभूती
Verse 8
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू
Verse 9
गुन अवगुन जानत सब कोई जो जेहि भाव नीक तेहि सोई
Verse 10
भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु
Verse 11
सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु
0:000:00
Speed: