Book 1 • Chapter 300
Section 300
10 verses
Verse 1
कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं
Verse 2
चले मत्तगज घंट बिराजी मनहुँ सुभग सावन घन राजी
Verse 3
बाहन अपर अनेक बिधाना सिबिका सुभग सुखासन जाना
Verse 4
तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृन्दा जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा
Verse 5
मागध सूत बंदि गुनगायक चले जान चढ़ि जो जेहि लायक
Verse 6
बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती चले बस्तु भरि अगनित भाँती
Verse 7
कोटिन्ह काँवरि चले कहारा बिबिध बस्तु को बरनै पारा
Verse 8
चले सकल सेवक समुदाई निज निज साजु समाजु बनाई
Verse 9
सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर
Verse 10
कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनू दोउ बीर
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