Book 1 • Chapter 303
Section 303
10 verses
Verse 1
बनइ न बरनत बनी बराता होहिं सगुन सुंदर सुभदाता
Verse 2
चारा चाषु बाम दिसि लेई मनहुँ सकल मंगल कहि देई
Verse 3
दाहिन काग सुखेत सुहावा नकुल दरसु सब काहूँ पावा
Verse 4
सानुकूल बह त्रिबिध बयारी सघट सवाल आव बर नारी
Verse 5
लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा
Verse 6
मृगमाला फिरि दाहिनि आई मंगल गन जनु दीन्हि देखाई
Verse 7
छेमकरी कह छेम बिसेषी स्यामा बाम सुतरु पर देखी
Verse 8
सनमुख आयउ दधि अरु मीना कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना
Verse 9
मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार
Verse 10
जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार
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