Book 1 • Chapter 324
Section 324
8 verses
Verse 1
जनक पाटमहिषी जग जानी सीय मातु किमि जाइ बखानी
Verse 2
सुजसु सुकृत सुख सुदंरताई सब समेटि बिधि रची बनाई
Verse 3
समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाई सुनत सुआसिनि सादर ल्याई
Verse 4
जनक बाम दिसि सोह सुनयना हिमगिरि संग बनि जनु मयना
Verse 5
कनक कलस मनि कोपर रूरे सुचि सुंगध मंगल जल पूरे
Verse 6
निज कर मुदित रायँ अरु रानी धरे राम के आगें आनी
Verse 7
पढ़हिं बेद मुनि मंगल बानी गगन सुमन झरि अवसरु जानी
Verse 8
बरु बिलोकि दंपति अनुरागे पाय पुनीत पखारन लागे
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