Book 1 • Chapter 330
Section 330
10 verses
Verse 1
नित नूतन मंगल पुर माहीं निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं
Verse 2
बड़े भोर भूपतिमनि जागे जाचक गुन गन गावन लागे
Verse 3
देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता किमि कहि जात मोदु मन जेता
Verse 4
प्रातक्रिया करि गे गुरु पाहीं महाप्रमोदु प्रेमु मन माहीं
Verse 5
करि प्रनाम पूजा कर जोरी बोले गिरा अमिअँ जनु बोरी
Verse 6
तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा भयउँ आजु मैं पूरनकाजा
Verse 7
अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं देहु धेनु सब भाँति बनाई
Verse 8
सुनि गुर करि महिपाल बड़ाई पुनि पठए मुनि बृंद बोलाई
Verse 9
बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि
Verse 10
आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि
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