Book 1 • Chapter 343
Section 343
10 verses
Verse 1
बार बार करि बिनय बड़ाई रघुपति चले संग सब भाई
Verse 2
जनक गहे कौसिक पद जाई चरन रेनु सिर नयनन्ह लाई
Verse 3
सुनु मुनीस बर दरसन तोरें अगमु न कछु प्रतीति मन मोरें
Verse 4
जो सुखु सुजसु लोकपति चहहीं करत मनोरथ सकुचत अहहीं
Verse 5
सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी सब सिधि तव दरसन अनुगामी
Verse 6
कीन्हि बिनय पुनि पुनि सिरु नाई फिरे महीसु आसिषा पाई
Verse 7
चली बरात निसान बजाई मुदित छोट बड़ सब समुदाई
Verse 8
रामहि निरखि ग्राम नर नारी पाइ नयन फलु होहिं सुखारी
Verse 9
बीच बीच बर बास करि मग लोगन्ह सुख देत
Verse 10
अवध समीप पुनीत दिन पहुँची आइ जनेत
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