Book 1 • Chapter 35
Section 35
15 verses
Verse 1
दरस परस मज्जन अरु पाना हरइ पाप कह बेद पुराना
Verse 2
नदी पुनीत अमित महिमा अति कहि न सकइ सारद बिमलमति
Verse 3
राम धामदा पुरी सुहावनि लोक समस्त बिदित अति पावनि
Verse 4
चारि खानि जग जीव अपारा अवध तजे तनु नहि संसारा
Verse 5
सब बिधि पुरी मनोहर जानी सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी
Verse 6
बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा सुनत नसाहिं काम मद दंभा
Verse 7
रामचरितमानस एहि नामा सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा
Verse 8
मन करि विषय अनल बन जरई होइ सुखी जौ एहिं सर परई
Verse 9
रामचरितमानस मुनि भावन बिरचेउ संभु सुहावन पावन
Verse 10
त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन
Verse 11
रचि महेस निज मानस राखा पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा
Verse 12
तातें रामचरितमानस बर धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर
Verse 13
कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई सादर सुनहु सुजन मन लाई
Verse 14
जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु
Verse 15
अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु
0:000:00
Speed: