Book 1 • Chapter 45
Section 45
10 verses
Verse 1
एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं
Verse 2
प्रति संबत अति होइ अनंदा मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा
Verse 3
एक बार भरि मकर नहाए सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए
Verse 4
जगबालिक मुनि परम बिबेकी भरव्दाज राखे पद टेकी
Verse 5
सादर चरन सरोज पखारे अति पुनीत आसन बैठारे
Verse 6
करि पूजा मुनि सुजस बखानी बोले अति पुनीत मृदु बानी
Verse 7
नाथ एक संसउ बड़ मोरें करगत बेदतत्व सबु तोरें
Verse 8
कहत सो मोहि लागत भय लाजा जौ न कहउँ बड़ होइ अकाजा
Verse 9
संत कहहि असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव
Verse 10
होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव
0:000:00
Speed: