Book 1 • Chapter 62
Section 62
10 verses
Verse 1
कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा यह अनुचित नहिं नेवत पठावा
Verse 2
दच्छ सकल निज सुता बोलाई हमरें बयर तुम्हउ बिसराई
Verse 3
ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना
Verse 4
जौं बिनु बोलें जाहु भवानी रहइ न सीलु सनेहु न कानी
Verse 5
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा
Verse 6
तदपि बिरोध मान जहँ कोई तहाँ गएँ कल्यानु न होई
Verse 7
भाँति अनेक संभु समुझावा भावी बस न ग्यानु उर आवा
Verse 8
कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ नहिं भलि बात हमारे भाएँ
Verse 9
कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि
Verse 10
दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि
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