Book 1 • Chapter 63
Section 63
10 verses
Verse 1
पिता भवन जब गई भवानी दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी
Verse 2
सादर भलेहिं मिली एक माता भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता
Verse 3
दच्छ न कछु पूछी कुसलाता सतिहि बिलोकि जरे सब गाता
Verse 4
सतीं जाइ देखेउ तब जागा कतहुँ न दीख संभु कर भागा
Verse 5
तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ
Verse 6
पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा जस यह भयउ महा परितापा
Verse 7
जद्यपि जग दारुन दुख नाना सब तें कठिन जाति अवमाना
Verse 8
समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा
Verse 9
सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध
Verse 10
सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध
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