Book 1 • Chapter 64
Section 64
10 verses
Verse 1
सुनहु सभासद सकल मुनिंदा कही सुनी जिन्ह संकर निंदा
Verse 2
सो फलु तुरत लहब सब काहूँ भली भाँति पछिताब पिताहूँ
Verse 3
संत संभु श्रीपति अपबादा सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा
Verse 4
काटिअ तासु जीभ जो बसाई श्रवन मूदि न त चलिअ पराई
Verse 5
जगदातमा महेसु पुरारी जगत जनक सब के हितकारी
Verse 6
पिता मंदमति निंदत तेही दच्छ सुक्र संभव यह देही
Verse 7
तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू
Verse 8
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा भयउ सकल मख हाहाकारा
Verse 9
सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस
Verse 10
जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस
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