Book 1 • Chapter 69
Section 69
10 verses
Verse 1
तदपि एक मैं कहउँ उपाई होइ करै जौं दैउ सहाई
Verse 2
जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं मिलहि उमहि तस संसय नाहीं
Verse 3
जे जे बर के दोष बखाने ते सब सिव पहि मैं अनुमाने
Verse 4
जौं बिबाहु संकर सन होई दोषउ गुन सम कह सबु कोई
Verse 5
जौं अहि सेज सयन हरि करहीं बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं
Verse 6
भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं
Verse 7
सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई
Verse 8
समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाई रबि पावक सुरसरि की नाई
Verse 9
जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ि बिबेक अभिमान
Verse 10
परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान
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