Book 1 • Chapter 7
Section 7
20 verses
Verse 1
अस बिबेक जब देइ बिधाता तब तजि दोष गुनहिं मनु राता
Verse 2
काल सुभाउ करम बरिआई भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाई
Verse 3
सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं
Verse 4
खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू
Verse 5
लखि सुबेष जग बंचक जेऊ बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ
Verse 6
उधरहिं अंत न होइ निबाहू कालनेमि जिमि रावन राहू
Verse 7
किएहुँ कुबेष साधु सनमानू जिमि जग जामवंत हनुमानू
Verse 8
हानि कुसंग सुसंगति लाहू लोकहुँ बेद बिदित सब काहू
Verse 9
गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा कीचहिं मिलइ नीच जल संगा
Verse 10
साधु असाधु सदन सुक सारीं सुमिरहिं राम देहिं गनि गारी
Verse 11
धूम कुसंगति कारिख होई लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई
Verse 12
सोइ जल अनल अनिल संघाता होइ जलद जग जीवन दाता
Verse 13
ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग
Verse 14
होहि कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग 7(क)
Verse 15
सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह
Verse 16
ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह 7(ख)
Verse 17
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि
Verse 18
बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि 7(ग)
Verse 19
देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब
Verse 20
बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब 7(घ)
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