Book 1 • Chapter 77
Section 77
10 verses
Verse 1
कह सिव जदपि उचित अस नाहीं नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं
Verse 2
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा परम धरमु यह नाथ हमारा
Verse 3
मातु पिता गुर प्रभु कै बानी बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी
Verse 4
तुम्ह सब भाँति परम हितकारी अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी
Verse 5
प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना
Verse 6
कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ अब उर राखेहु जो हम कहेऊ
Verse 7
अंतरधान भए अस भाषी संकर सोइ मूरति उर राखी
Verse 8
तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए बोले प्रभु अति बचन सुहाए
Verse 9
पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु
Verse 10
गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु
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