Book 1 • Chapter 84
Section 84
8 verses
Verse 1
तदपि करब मैं काजु तुम्हारा श्रुति कह परम धरम उपकारा
Verse 2
पर हित लागि तजइ जो देही संतत संत प्रसंसहिं तेही
Verse 3
अस कहि चलेउ सबहि सिरु नाई सुमन धनुष कर सहित सहाई
Verse 4
चलत मार अस हृदयँ बिचारा सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा
Verse 5
तब आपन प्रभाउ बिस्तारा निज बस कीन्ह सकल संसारा
Verse 6
कोपेउ जबहि बारिचरकेतू छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू
Verse 7
ब्रह्मचर्ज ब्रत संजम नाना धीरज धरम ग्यान बिग्याना
Verse 8
सदाचार जप जोग बिरागा सभय बिबेक कटकु सब भागा
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