Book 4 • Chapter 3
Section 3
10 verses
Verse 1
जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें
Verse 2
नाथ जीव तव मायाँ मोहा सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा
Verse 3
ता पर मैं रघुबीर दोहाई जानउँ नहिं कछु भजन उपाई
Verse 4
सेवक सुत पति मातु भरोसें रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें
Verse 5
अस कहि परेउ चरन अकुलाई निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई
Verse 6
तब रघुपति उठाइ उर लावा निज लोचन जल सींचि जुड़ावा
Verse 7
सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना
Verse 8
समदरसी मोहि कह सब कोऊ सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ
Verse 9
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत
Verse 10
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत
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