Book 4 • Chapter 5
Section 5
10 verses
Verse 1
कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा लछमिन राम चरित सब भाषा
Verse 2
कह सुग्रीव नयन भरि बारी मिलिहि नाथ मिथिलेसकुमारी
Verse 3
मंत्रिन्ह सहित इहाँ एक बारा बैठ रहेउँ मैं करत बिचारा
Verse 4
गगन पंथ देखी मैं जाता परबस परी बहुत बिलपाता
Verse 5
राम राम हा राम पुकारी हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी
Verse 6
मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा पट उर लाइ सोच अति कीन्हा
Verse 7
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा तजहु सोच मन आनहु धीरा
Verse 8
सब प्रकार करिहउँ सेवकाई जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई
Verse 9
सखा बचन सुनि हरषे कृपासिधु बलसींव
Verse 10
कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव
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