Book 6 • Chapter 104
Section 104
13 verses
Verse 1
पति सिर देखत मंदोदरी मुरुछित बिकल धरनि खसि परी
Verse 2
जुबति बृंद रोवत उठि धाईं तेहि उठाइ रावन पहिं आई
Verse 3
पति गति देखि ते करहिं पुकारा छूटे कच नहिं बपुष सँभारा
Verse 4
उर ताड़ना करहिं बिधि नाना रोवत करहिं प्रताप बखाना
Verse 5
तव बल नाथ डोल नित धरनी तेज हीन पावक ससि तरनी
Verse 6
सेष कमठ सहि सकहिं न भारा सो तनु भूमि परेउ भरि छारा
Verse 7
बरुन कुबेर सुरेस समीरा रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा
Verse 8
भुजबल जितेहु काल जम साईं आजु परेहु अनाथ की नाईं
Verse 9
जगत बिदित तुम्हारी प्रभुताई सुत परिजन बल बरनि न जाई
Verse 10
राम बिमुख अस हाल तुम्हारा रहा न कोउ कुल रोवनिहारा
Verse 11
तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा सभय दिसिप नित नावहिं माथा
Verse 12
अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं राम बिमुख यह अनुचित नाहीं
Verse 13
काल बिबस पति कहा न माना अग जग नाथु मनुज करि जाना
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