Book 6 • Chapter 105
Section 105
8 verses
Verse 1
मंदोदरी बचन सुनि काना सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना
Verse 2
अज महेस नारद सनकादी जे मुनिबर परमारथबादी
Verse 3
भरि लोचन रघुपतिहि निहारी प्रेम मगन सब भए सुखारी
Verse 4
रुदन करत देखीं सब नारी गयउ बिभीषनु मन दुख भारी
Verse 5
बंधु दसा बिलोकि दुख कीन्हा तब प्रभु अनुजहि आयसु दीन्हा
Verse 6
लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आयो
Verse 7
कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका करहु क्रिया परिहरि सब सोका
Verse 8
कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी बिधिवत देस काल जियँ जानी
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