Book 6 • Chapter 20
Section 20
10 verses
Verse 1
कह दसकंठ कवन तैं बंदर मैं रघुबीर दूत दसकंधर
Verse 2
मम जनकहि तोहि रही मिताई तव हित कारन आयउँ भाई
Verse 3
उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती
Verse 4
बर पायहु कीन्हेहु सब काजा जीतेहु लोकपाल सब राजा
Verse 5
नृप अभिमान मोह बस किंबा हरि आनिहु सीता जगदंबा
Verse 6
अब सुभ कहा सुनहु तुम्ह मोरा सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा
Verse 7
दसन गहहु तृन कंठ कुठारी परिजन सहित संग निज नारी
Verse 8
सादर जनकसुता करि आगें एहि बिधि चलहु सकल भय त्यागें
Verse 9
प्रनतपाल रघुबंसमनि त्राहि त्राहि अब मोहि
Verse 10
आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करैगो तोहि
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