Book 6 • Chapter 22
Section 22
12 verses
Verse 1
सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई चाहत जासु चरन सेवकाई
Verse 2
तासु दूत होइ हम कुल बोरा अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा
Verse 3
सुनि कठोर बानी कपि केरी कहत दसानन नयन तरेरी
Verse 4
खल तव कठिन बचन सब सहऊँ नीति धर्म मैं जानत अहऊँ
Verse 5
कह कपि धर्मसीलता तोरी हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी
Verse 6
देखी नयन दूत रखवारी बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी
Verse 7
कान नाक बिनु भगिनि निहारी छमा कीन्हि तुम्ह धर्म बिचारी
Verse 8
धर्मसीलता तव जग जागी पावा दरसु हमहुँ बड़भागी
Verse 9
जनि जल्पसि जड़ जंतु कपि सठ बिलोकु मम बाहु
Verse 10
लोकपाल बल बिपुल ससि ग्रसन हेतु सब राहु 22(क)
Verse 11
पुनि नभ सर मम कर निकर कमलन्हि पर करि बास
Verse 12
सोभत भयउ मराल इव संभु सहित कैलास 22(ख)
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