Book 6 • Chapter 23
Section 23
22 verses
Verse 1
तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद मो सन भिरिहि कवन जोधा बद
Verse 2
तव प्रभु नारि बिरहँ बलहीना अनुज तासु दुख दुखी मलीना
Verse 3
तुम्ह सुग्रीव कूलद्रुम दोऊ अनुज हमार भीरु अति सोऊ
Verse 4
जामवंत मंत्री अति बूढ़ा सो कि होइ अब समरारूढ़ा
Verse 5
सिल्पि कर्म जानहिं नल नीला है कपि एक महा बलसीला
Verse 6
आवा प्रथम नगरु जेंहिं जारा सुनत बचन कह बालिकुमारा
Verse 7
सत्य बचन कहु निसिचर नाहा साँचेहुँ कीस कीन्ह पुर दाहा
Verse 8
रावन नगर अल्प कपि दहई सुनि अस बचन सत्य को कहई
Verse 9
जो अति सुभट सराहेहु रावन सो सुग्रीव केर लघु धावन
Verse 10
चलइ बहुत सो बीर न होई पठवा खबरि लेन हम सोई
Verse 11
सत्य नगरु कपि जारेउ बिनु प्रभु आयसु पाइ
Verse 12
फिरि न गयउ सुग्रीव पहिं तेहिं भय रहा लुकाइ 23(क)
Verse 13
सत्य कहहि दसकंठ सब मोहि न सुनि कछु कोह
Verse 14
कोउ न हमारें कटक अस तो सन लरत जो सोह 23(ख)
Verse 15
प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आहि
Verse 16
जौं मृगपति बध मेड़ुकन्हि भल कि कहइ कोउ ताहि 23(ग)
Verse 17
जद्यपि लघुता राम कहुँ तोहि बधें बड़ दोष
Verse 18
तदपि कठिन दसकंठ सुनु छत्र जाति कर रोष 23(घ)
Verse 19
बक्र उक्ति धनु बचन सर हृदय दहेउ रिपु कीस
Verse 20
प्रतिउत्तर सड़सिन्ह मनहुँ काढ़त भट दससीस 23(ङ)
Verse 21
हँसि बोलेउ दसमौलि तब कपि कर बड़ गुन एक
Verse 22
जो प्रतिपालइ तासु हित करइ उपाय अनेक 23(छ)
0:000:00
Speed: