Book 6 • Chapter 36
Section 36
15 verses
Verse 1
कंत समुझि मन तजहु कुमतिही सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही
Verse 2
रामानुज लघु रेख खचाई सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई
Verse 3
पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा जाके दूत केर यह कामा
Verse 4
कौतुक सिंधु नाघी तव लंका आयउ कपि केहरी असंका
Verse 5
रखवारे हति बिपिन उजारा देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा
Verse 6
जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा
Verse 7
अब पति मृषा गाल जनि मारहु मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु
Verse 8
पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु अग जग नाथ अतुल बल जानहु
Verse 9
बान प्रताप जान मारीचा तासु कहा नहिं मानेहि नीचा
Verse 10
जनक सभाँ अगनित भूपाला रहे तुम्हउ बल अतुल बिसाला
Verse 11
भंजि धनुष जानकी बिआही तब संग्राम जितेहु किन ताही
Verse 12
सुरपति सुत जानइ बल थोरा राखा जिअत आँखि गहि फोरा
Verse 13
सूपनखा कै गति तुम्ह देखी तदपि हृदयँ नहिं लाज बिषेषी
Verse 14
बधि बिराध खर दूषनहि लींलाँ हत्यो कबंध
Verse 15
बालि एक सर मारयो तेहि जानहु दसकंध
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