Book 6 • Chapter 4
Section 4
11 verses
Verse 1
बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा देखि कृपानिधि के मन भावा
Verse 2
चली सेन कछु बरनि न जाई गर्जहिं मर्कट भट समुदाई
Verse 3
सेतुबंध ढिग चढ़ि रघुराई चितव कृपाल सिंधु बहुताई
Verse 4
देखन कहुँ प्रभु करुना कंदा प्रगट भए सब जलचर बृंदा
Verse 5
मकर नक्र नाना झष ब्याला सत जोजन तन परम बिसाला
Verse 6
अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं
Verse 7
प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे मन हरषित सब भए सुखारे
Verse 8
तिन्ह की ओट न देखिअ बारी मगन भए हरि रूप निहारी
Verse 9
चला कटकु प्रभु आयसु पाई को कहि सक कपि दल बिपुलाई
Verse 10
सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं
Verse 11
अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं
0:000:00
Speed: