Book 6 • Chapter 87
Section 87
10 verses
Verse 1
एहीं बीच निसाचर अनी कसमसात आई अति घनी
Verse 2
देखि चले सन्मुख कपि भट्टा प्रलयकाल के जनु घन घट्टा
Verse 3
बहु कृपान तरवारि चमंकहिं जनु दहँ दिसि दामिनीं दमंकहिं
Verse 4
गज रथ तुरग चिकार कठोरा गर्जहिं मनहुँ बलाहक घोरा
Verse 5
कपि लंगूर बिपुल नभ छाए मनहुँ इंद्रधनु उए सुहाए
Verse 6
उठइ धूरि मानहुँ जलधारा बान बुंद भै बृष्टि अपारा
Verse 7
दुहुँ दिसि पर्बत करहिं प्रहारा बज्रपात जनु बारहिं बारा
Verse 8
रघुपति कोपि बान झरि लाई घायल भै निसिचर समुदाई
Verse 9
लागत बान बीर चिक्करहीं घुर्मि घुर्मि जहँ तहँ महि परहीं
Verse 10
स्त्रवहिं सैल जनु निर्झर भारी सोनित सरि कादर भयकारी
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