Book 6 • Chapter 95
Section 95
8 verses
Verse 1
देखा श्रमित बिभीषनु भारी धायउ हनूमान गिरि धारी
Verse 2
रथ तुरंग सारथी निपाता हृदय माझ तेहि मारेसि लाता
Verse 3
ठाढ़ रहा अति कंपित गाता गयउ बिभीषनु जहँ जनत्राता
Verse 4
पुनि रावन कपि हतेउ पचारी चलेउ गगन कपि पूँछ पसारी
Verse 5
गहिसि पूँछ कपि सहित उड़ाना पुनि फिरि भिरेउ प्रबल हनुमाना
Verse 6
लरत अकास जुगल सम जोधा एकहि एकु हनत करि क्रोधा
Verse 7
सोहहिं नभ छल बल बहु करहीं कज्जल गिरि सुमेरु जनु लरहीं
Verse 8
बुधि बल निसिचर परइ न पार् यो तब मारुत सुत प्रभु संभार् यो
0:000:00
Speed: