Book 5 • Chapter 34
Section 34
10 verses
Verse 1
नाथ भगति अति सुखदायनी देहु कृपा करि अनपायनी
Verse 2
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी एवमस्तु तब कहेउ भवानी
Verse 3
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना ताहि भजनु तजि भाव न आना
Verse 4
यह संवाद जासु उर आवा रघुपति चरन भगति सोइ पावा
Verse 5
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा जय जय जय कृपाल सुखकंदा
Verse 6
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा कहा चलैं कर करहु बनावा
Verse 7
अब बिलंबु केहि कारन कीजे तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे
Verse 8
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी नभ तें भवन चले सुर हरषी
Verse 9
कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ
Verse 10
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ
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