Book 7 • Chapter 103
Section 103
8 verses
Verse 1
कृतजुग सब जोगी बिग्यानी करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी
Verse 2
त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं
Verse 3
द्वापर करि रघुपति पद पूजा नर भव तरहिं उपाय न दूजा
Verse 4
कलिजुग केवल हरि गुन गाहा गावत नर पावहिं भव थाहा
Verse 5
कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना एक अधार राम गुन गाना
Verse 6
सब भरोस तजि जो भज रामहि प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि
Verse 7
सोइ भव तर कछु संसय नाहीं नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं
Verse 8
कलि कर एक पुनीत प्रतापा मानस पुन्य होहिं नहिं पापा
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