Book 7 • Chapter 110
Section 110
16 verses
Verse 1
त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ
Verse 2
एक सूल मोहि बिसर न काऊ गुर कर कोमल सील सुभाऊ
Verse 3
चरम देह द्विज कै मैं पाई सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई
Verse 4
खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला करउँ सकल रघुनायक लीला
Verse 5
प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा
Verse 6
मन ते सकल बासना भागी केवल राम चरन लय लागी
Verse 7
कहु खगेस अस कवन अभागी खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी
Verse 8
प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई
Verse 9
भए कालबस जब पितु माता मैं बन गयउँ भजन जनत्राता
Verse 10
जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ
Verse 11
बूझत तिन्हहि राम गुन गाहा कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा
Verse 12
सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा अब्याहत गति संभु प्रसादा
Verse 13
छूटी त्रिबिध ईषना गाढ़ी एक लालसा उर अति बाढ़ी
Verse 14
राम चरन बारिज जब देखौं तब निज जन्म सफल करि लेखौं
Verse 15
जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई ईस्वर सर्ब भूतमय अहई
Verse 16
निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई
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