Book 7 • Chapter 111
Section 111
16 verses
Verse 1
तब मुनिष रघुपति गुन गाथा कहे कछुक सादर खगनाथा
Verse 2
ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानि मोहि परम अधिकारी जानी
Verse 3
लागे करन ब्रह्म उपदेसा अज अद्वेत अगुन हृदयेसा
Verse 4
अकल अनीह अनाम अरुपा अनुभव गम्य अखंड अनूपा
Verse 5
मन गोतीत अमल अबिनासी निर्बिकार निरवधि सुख रासी
Verse 6
सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा बारि बीचि इव गावहि बेदा
Verse 7
बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा
Verse 8
पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा सगुन उपासन कहहु मुनीसा
Verse 9
राम भगति जल मम मन मीना किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना
Verse 10
सोइ उपदेस कहहु करि दाया निज नयनन्हि देखौं रघुराया
Verse 11
भरि लोचन बिलोकि अवधेसा तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा
Verse 12
मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा खंडि सगुन मत अगुन निरूपा
Verse 13
तब मैं निर्गुन मत कर दूरी सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी
Verse 14
उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा
Verse 15
सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ
Verse 16
अति संघरषन जौं कर कोई अनल प्रगट चंदन ते होई
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