Book 7 • Chapter 112
Section 112
16 verses
Verse 1
कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें
Verse 2
परद्रोही की होहिं निसंका कामी पुनि कि रहहिं अकलंका
Verse 3
बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें
Verse 4
काहू सुमति कि खल सँग जामी सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी
Verse 5
भव कि परहिं परमात्मा बिंदक सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक
Verse 6
राजु कि रहइ नीति बिनु जानें अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें
Verse 7
पावन जस कि पुन्य बिनु होई बिनु अघ अजस कि पावइ कोई
Verse 8
लाभु कि किछु हरि भगति समाना जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना
Verse 9
हानि कि जग एहि सम किछु भाई भजिअ न रामहि नर तनु पाई
Verse 10
अघ कि पिसुनता सम कछु आना धर्म कि दया सरिस हरिजाना
Verse 11
एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ
Verse 12
पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा
Verse 13
मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि
Verse 14
सत्य बचन बिस्वास न करही बायस इव सबही ते डरही
Verse 15
सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला सपदि होहि पच्छी चंडाला
Verse 16
लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई नहिं कछु भय न दीनता आई
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