Book 7 • Chapter 113
Section 113
16 verses
Verse 1
सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन
Verse 2
कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी लीन्हि प्रेम परिच्छा मोरी
Verse 3
मन बच क्रम मोहि निज जन जाना मुनि मति पुनि फेरी भगवाना
Verse 4
रिषि मम महत सीलता देखी राम चरन बिस्वास बिसेषी
Verse 5
अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई
Verse 6
मम परितोष बिबिध बिधि कीन्हा हरषित राममंत्र तब दीन्हा
Verse 7
बालकरूप राम कर ध्याना कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना
Verse 8
सुंदर सुखद मिहि अति भावा सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा
Verse 9
मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा रामचरितमानस तब भाषा
Verse 10
सादर मोहि यह कथा सुनाई पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई
Verse 11
रामचरित सर गुप्त सुहावा संभु प्रसाद तात मैं पावा
Verse 12
तोहि निज भगत राम कर जानी ताते मैं सब कहेउँ बखानी
Verse 13
राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं
Verse 14
मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा
Verse 15
निज कर कमल परसि मम सीसा हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा
Verse 16
राम भगति अबिरल उर तोरें बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें
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