Book 7 • Chapter 115
Section 115
20 verses
Verse 1
जे असि भगति जानि परिहरहीं केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं
Verse 2
ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी खोजत आकु फिरहिं पय लागी
Verse 3
सुनु खगेस हरि भगति बिहाई जे सुख चाहहिं आन उपाई
Verse 4
ते सठ महासिंधु बिनु तरनी पैरि पार चाहहिं जड़ करनी
Verse 5
सुनि भसुंडि के बचन भवानी बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी
Verse 6
तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं संसय सोक मोह भ्रम नाहीं
Verse 7
सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा
Verse 8
एक बात प्रभु पूँछउँ तोही कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही
Verse 9
कहहिं संत मुनि बेद पुराना नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना
Verse 10
सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं नहिं आदरेहु भगति की नाईं
Verse 11
ग्यानहि भगतिहि अंतर केता सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता
Verse 12
सुनि उरगारि बचन सुख माना सादर बोलेउ काग सुजाना
Verse 13
भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा उभय हरहिं भव संभव खेदा
Verse 14
नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर सावधान सोउ सुनु बिहंगबर
Verse 15
ग्यान बिराग जोग बिग्याना ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना
Verse 16
पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती अबला अबल सहज जड़ जाती
Verse 17
-पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर
Verse 18
न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर 115(क)
Verse 19
सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि
Verse 20
बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट 115(ख)
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