Book 7 • Chapter 116
Section 116
8 verses
Verse 1
इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ बेद पुरान संत मत भाषउँ
Verse 2
मोह न नारि नारि कें रूपा पन्नगारि यह रीति अनूपा
Verse 3
माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ नारि बर्ग जानइ सब कोऊ
Verse 4
पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी माया खलु नर्तकी बिचारी
Verse 5
भगतिहि सानुकूल रघुराया ताते तेहि डरपति अति माया
Verse 6
राम भगति निरुपम निरुपाधी बसइ जासु उर सदा अबाधी
Verse 7
तेहि बिलोकि माया सकुचाई करि न सकइ कछु निज प्रभुताई
Verse 8
अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी जाचहीं भगति सकल सुख खानी
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