Book 7 • Chapter 117
Section 117
24 verses
Verse 1
सुनहु तात यह अकथ कहानी समुझत बनइ न जाइ बखानी
Verse 2
ईस्वर अंस जीव अबिनासी चेतन अमल सहज सुख रासी
Verse 3
सो मायाबस भयउ गोसाईं बँध्यो कीर मरकट की नाई
Verse 4
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई जदपि मृषा छूटत कठिनई
Verse 5
तब ते जीव भयउ संसारी छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी
Verse 6
श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई छूट न अधिक अधिक अरुझाई
Verse 7
जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी
Verse 8
अस संजोग ईस जब करई तबहुँ कदाचित सो निरुअरई
Verse 9
सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई
Verse 10
जप तप ब्रत जम नियम अपारा जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा
Verse 11
तेइ तृन हरित चरै जब गाई भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई
Verse 12
नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा निर्मल मन अहीर निज दासा
Verse 13
परम धर्ममय पय दुहि भाई अवटै अनल अकाम बनाई
Verse 14
तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै धृति सम जावनु देइ जमावै
Verse 15
मुदिताँ मथैं बिचार मथानी दम अधार रजु सत्य सुबानी
Verse 16
तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता बिमल बिराग सुभग सुपुनीता
Verse 17
जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ
Verse 18
बुद्धि सिरावैं ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ 117(क)
Verse 19
तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ
Verse 20
चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ 117(ख)
Verse 21
तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि
Verse 22
तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि 117(ग)
Verse 23
एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय
Verse 24
जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब 117(घ)
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