Book 7 • Chapter 120
Section 120
19 verses
Verse 1
कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई
Verse 2
राम भगति चिंतामनि सुंदर बसइ गरुड़ जाके उर अंतर
Verse 3
परम प्रकास रूप दिन राती नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती
Verse 4
मोह दरिद्र निकट नहिं आवा लोभ बात नहिं ताहि बुझावा
Verse 5
प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई हारहिं सकल सलभ समुदाई
Verse 6
खल कामादि निकट नहिं जाहीं बसइ भगति जाके उर माहीं
Verse 7
गरल सुधासम अरि हित होई तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई
Verse 8
ब्यापहिं मानस रोग न भारी जिन्ह के बस सब जीव दुखारी
Verse 9
राम भगति मनि उर बस जाकें दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें
Verse 10
चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं जे मनि लागि सुजतन कराहीं
Verse 11
सो मनि जदपि प्रगट जग अहई राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई
Verse 12
सुगम उपाय पाइबे केरे नर हतभाग्य देहिं भटमेरे
Verse 13
पावन पर्बत बेद पुराना राम कथा रुचिराकर नाना
Verse 14
मर्मी सज्जन सुमति कुदारी ग्यान बिराग नयन उरगारी
Verse 15
भाव सहित खोजइ जो प्रानी पाव भगति मनि सब सुख खानी
Verse 16
मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा राम ते अधिक राम कर दासा
Verse 17
राम सिंधु घन सज्जन धीरा चंदन तरु हरि संत समीरा
Verse 18
सब कर फल हरि भगति सुहाई सो बिनु संत न काहूँ पाई
Verse 19
अस बिचारि जोइ कर सतसंगा राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा
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