Book 7 • Chapter 121
Section 121
37 verses
Verse 1
पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ
Verse 2
नाथ मोहि निज सेवक जानी सप्त प्रस्न कहहु बखानी
Verse 3
प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा सब ते दुर्लभ कवन सरीरा
Verse 4
बड़ दुख कवन कवन सुख भारी सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी
Verse 5
संत असंत मरम तुम्ह जानहु तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु
Verse 6
कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला कहहु कवन अघ परम कराला
Verse 7
मानस रोग कहहु समुझाई तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई
Verse 8
तात सुनहु सादर अति प्रीती मैं संछेप कहउँ यह नीती
Verse 9
नर तन सम नहिं कवनिउ देही जीव चराचर जाचत तेही
Verse 10
नरग स्वर्ग अपबर्ग निसेनी ग्यान बिराग भगति सुभ देनी
Verse 11
सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर होहिं बिषय रत मंद मंद तर
Verse 12
काँच किरिच बदलें ते लेही कर ते डारि परस मनि देहीं
Verse 13
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं संत मिलन सम सुख जग नाहीं
Verse 14
पर उपकार बचन मन काया संत सहज सुभाउ खगराया
Verse 15
संत सहहिं दुख परहित लागी परदुख हेतु असंत अभागी
Verse 16
भूर्ज तरू सम संत कृपाला परहित निति सह बिपति बिसाला
Verse 17
सन इव खल पर बंधन करई खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई
Verse 18
खल बिनु स्वारथ पर अपकारी अहि मूषक इव सुनु उरगारी
Verse 19
पर संपदा बिनासि नसाहीं जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं
Verse 20
दुष्ट उदय जग आरति हेतू जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू
Verse 21
संत उदय संतत सुखकारी बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी
Verse 22
परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा पर निंदा सम अघ न गरीसा
Verse 23
हर गुर निंदक दादुर होई जन्म सहस्त्र पाव तन सोई
Verse 24
द्विज निंदक बहु नरक भोग करि जग जनमइ बायस सरीर धरि
Verse 25
सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी रौरव नरक परहिं ते प्रानी
Verse 26
होहिं उलूक संत निंदा रत मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत
Verse 27
सब के निंदा जे जड़ करहीं ते चमगादुर होइ अवतरहीं
Verse 28
सुनहु तात अब मानस रोगा जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा
Verse 29
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला
Verse 30
काम बात कफ लोभ अपारा क्रोध पित्त नित छाती जारा
Verse 31
प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई उपजइ सन्यपात दुखदाई
Verse 32
बिषय मनोरथ दुर्गम नाना ते सब सूल नाम को जाना
Verse 33
ममता दादु कंडु इरषाई हरष बिषाद गरह बहुताई
Verse 34
पर सुख देखि जरनि सोइ छई कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई
Verse 35
अहंकार अति दुखद डमरुआ दंभ कपट मद मान नेहरुआ
Verse 36
तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी
Verse 37
जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका कहँ लागि कहौं कुरोग अनेका
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