Book 7 • Chapter 122
Section 122
25 verses
Verse 1
एहि बिधि सकल जीव जग रोगी सोक हरष भय प्रीति बियोगी
Verse 2
मानक रोग कछुक मैं गाए हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए
Verse 3
जाने ते छीजहिं कछु पापी नास न पावहिं जन परितापी
Verse 4
बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे
Verse 5
राम कृपाँ नासहि सब रोगा जौं एहि भाँति बनै संयोगा
Verse 6
सदगुर बैद बचन बिस्वासा संजम यह न बिषय कै आसा
Verse 7
रघुपति भगति सजीवन मूरी अनूपान श्रद्धा मति पूरी
Verse 8
एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं
Verse 9
जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई जब उर बल बिराग अधिकाई
Verse 10
सुमति छुधा बाढ़इ नित नई बिषय आस दुर्बलता गई
Verse 11
बिमल ग्यान जल जब सो नहाई तब रह राम भगति उर छाई
Verse 12
सिव अज सुक सनकादिक नारद जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद
Verse 13
सब कर मत खगनायक एहा करिअ राम पद पंकज नेहा
Verse 14
श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं रघुपति भगति बिना सुख नाहीं
Verse 15
कमठ पीठ जामहिं बरु बारा बंध्या सुत बरु काहुहि मारा
Verse 16
फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला
Verse 17
तृषा जाइ बरु मृगजल पाना बरु जामहिं सस सीस बिषाना
Verse 18
अंधकारु बरु रबिहि नसावै राम बिमुख न जीव सुख पावै
Verse 19
हिम ते अनल प्रगट बरु होई बिमुख राम सुख पाव न कोई
Verse 20
उबारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल
Verse 21
बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल 122(क)
Verse 22
मसकहि करइ बिंरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन
Verse 23
अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन 122(ख)
Verse 24
विनिच्श्रितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे
Verse 25
हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते 122(ग)
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