Book 7 • Chapter 123
Section 123
12 verses
Verse 1
कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा ब्यास समास स्वमति अनुरुपा
Verse 2
श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी राम भजिअ सब काज बिसारी
Verse 3
प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही मोहि से सठ पर ममता जाही
Verse 4
तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा
Verse 5
पूछिहुँ राम कथा अति पावनि सुक सनकादि संभु मन भावनि
Verse 6
सत संगति दुर्लभ संसारा निमिष दंड भरि एकउ बारा
Verse 7
देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी मैं रघुबीर भजन अधिकारी
Verse 8
सकुनाधम सब भाँति अपावन प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन
Verse 9
आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन
Verse 10
निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन 123(क)
Verse 11
नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु गोइ
Verse 12
चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोइ
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