Book 7 • Chapter 16
Section 16
8 verses
Verse 1
बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं जिमि परद्रोह संत मन माही
Verse 2
तब रघुपति सब सखा बोलाए आइ सबन्हि सादर सिरु नाए
Verse 3
परम प्रीति समीप बैठारे भगत सुखद मृदु बचन उचारे
Verse 4
तुम्ह अति कीन्ह मोरि सेवकाई मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई
Verse 5
ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे मम हित लागि भवन सुख त्यागे
Verse 6
अनुज राज संपति बैदेही देह गेह परिवार सनेही
Verse 7
सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना मृषा न कहउँ मोर यह बाना
Verse 8
सब के प्रिय सेवक यह नीती मोरें अधिक दास पर प्रीती
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