Book 7 • Chapter 2
Section 2
16 verses
Verse 1
देखत हनूमान अति हरषेउ पुलक गात लोचन जल बरषेउ
Verse 2
मन महँ बहुत भाँति सुख मानी बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी
Verse 3
जासु बिरहँ सोचहु दिन राती रटहु निरंतर गुन गन पाँती
Verse 4
रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता आयउ कुसल देव मुनि त्राता
Verse 5
रिपु रन जीति सुजस सुर गावत सीता सहित अनुज प्रभु आवत
Verse 6
सुनत बचन बिसरे सब दूखा तृषावंत जिमि पाइ पियूषा
Verse 7
को तुम्ह तात कहाँ ते आए मोहि परम प्रिय बचन सुनाए
Verse 8
मारुत सुत मैं कपि हनुमाना नामु मोर सुनु कृपानिधाना
Verse 9
दीनबंधु रघुपति कर किंकर सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर
Verse 10
मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता नयन स्त्रवत जल पुलकित गाता
Verse 11
कपि तव दरस सकल दुख बीते मिले आजु मोहि राम पिरीते
Verse 12
बार बार बूझी कुसलाता तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता
Verse 13
एहि संदेस सरिस जग माहीं करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं
Verse 14
नाहिन तात उरिन मैं तोही अब प्रभु चरित सुनावहु मोही
Verse 15
तब हनुमंत नाइ पद माथा कहे सकल रघुपति गुन गाथा
Verse 16
कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं सुमिरहिं मोहि दास की नाईं
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