Book 7 • Chapter 25
Section 25
8 verses
Verse 1
सेवहिं सानकूल सब भाई राम चरन रति अति अधिकाई
Verse 2
प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं
Verse 3
राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती नाना भाँति सिखावहिं नीती
Verse 4
हरषित रहहिं नगर के लोगा करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा
Verse 5
अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं
Verse 6
दुइ सुत सुन्दर सीताँ जाए लव कुस बेद पुरानन्ह गाए
Verse 7
दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर
Verse 8
दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे भए रूप गुन सील घनेरे
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