Book 7 • Chapter 30
Section 30
10 verses
Verse 1
जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं बैठि परसपर इहइ सिखावहिं
Verse 2
भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि सोभा सील रूप गुन धामहि
Verse 3
जलज बिलोचन स्यामल गातहि पलक नयन इव सेवक त्रातहि
Verse 4
धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि संत कंज बन रबि रनधीरहि
Verse 5
काल कराल ब्याल खगराजहि नमत राम अकाम ममता जहि
Verse 6
लोभ मोह मृगजूथ किरातहि मनसिज करि हरि जन सुखदातहि
Verse 7
संसय सोक निबिड़ तम भानुहि दनुज गहन घन दहन कृसानुहि
Verse 8
जनकसुता समेत रघुबीरहि कस न भजहु भंजन भव भीरहि
Verse 9
बहु बासना मसक हिम रासिहि सदा एकरस अज अबिनासिहि
Verse 10
मुनि रंजन भंजन महि भारहि तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि
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