Book 7 • Chapter 31
Section 31
8 verses
Verse 1
जब ते राम प्रताप खगेसा उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा
Verse 2
पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका
Verse 3
जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी प्रथम अबिद्या निसा नसानी
Verse 4
अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने काम क्रोध कैरव सकुचाने
Verse 5
बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ ए चकोर सुख लहहिं न काऊ
Verse 6
मत्सर मान मोह मद चोरा इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा
Verse 7
धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना ए पंकज बिकसे बिधि नाना
Verse 8
सुख संतोष बिराग बिबेका बिगत सोक ए कोक अनेका
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