Book 7 • Chapter 45
Section 45
8 verses
Verse 1
जौं परलोक इहाँ सुख चहहू सुनि मम बचन ह्रृदयँ दृढ़ गहहू
Verse 2
सुलभ सुखद मारग यह भाई भगति मोरि पुरान श्रुति गाई
Verse 3
ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका साधन कठिन न मन कहुँ टेका
Verse 4
करत कष्ट बहु पावइ कोऊ भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ
Verse 5
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी
Verse 6
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता सतसंगति संसृति कर अंता
Verse 7
पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा
Verse 8
सानुकूल तेहि पर मुनि देवा जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा
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