Book 7 • Chapter 46
Section 46
8 verses
Verse 1
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा जोग न मख जप तप उपवासा
Verse 2
सरल सुभाव न मन कुटिलाई जथा लाभ संतोष सदाई
Verse 3
मोर दास कहाइ नर आसा करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा
Verse 4
बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई एहि आचरन बस्य मैं भाई
Verse 5
बैर न बिग्रह आस न त्रासा सुखमय ताहि सदा सब आसा
Verse 6
अनारंभ अनिकेत अमानी अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी
Verse 7
प्रीति सदा सज्जन संसर्गा तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा
Verse 8
भगति पच्छ हठ नहिं सठताई दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई
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