Book 7 • Chapter 72
Section 72
8 verses
Verse 1
जो माया सब जगहि नचावा जासु चरित लखि काहुँ न पावा
Verse 2
सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा नाच नटी इव सहित समाजा
Verse 3
सोइ सच्चिदानंद घन रामा अज बिग्यान रूपो बल धामा
Verse 4
ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता अखिल अमोघसक्ति भगवंता
Verse 5
अगुन अदभ्र गिरा गोतीता सबदरसी अनवद्य अजीता
Verse 6
निर्मम निराकार निरमोहा नित्य निरंजन सुख संदोहा
Verse 7
प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी
Verse 8
इहाँ मोह कर कारन नाहीं रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं
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