Book 7 • Chapter 73
Section 73
9 verses
Verse 1
असि रघुपति लीला उरगारी दनुज बिमोहनि जन सुखकारी
Verse 2
जे मति मलिन बिषयबस कामी प्रभु मोह धरहिं इमि स्वामी
Verse 3
नयन दोष जा कहँ जब होई पीत बरन ससि कहुँ कह सोई
Verse 4
जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा
Verse 5
नौकारूढ़ चलत जग देखा अचल मोह बस आपुहि लेखा
Verse 6
बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादीं कहहिं परस्पर मिथ्याबादी
Verse 7
हरि बिषइक अस मोह बिहंगा सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा
Verse 8
मायाबस मतिमंद अभागी हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी
Verse 9
ते सठ हठ बस संसय करहीं निज अग्यान राम पर धरहीं
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